Thursday, December 08, 2016

Hiraeth

It's a calming feeling, Poseidon calling my name
What's left of you to fight, come, they've lost the game

Hold my hand warrior, they've taken your Rome
Close your eyes, my son and let the water take you home

It's been years since I've seen my mother
Since I left my land of songs and dance
I've lost sleep, in my dreams visions overlap each other
Whose curse was it that stole my last chance

It would have been my hour of glory
When I push the dagger into his blasphemous heart
They would have written ballads, told my story
But I listened to him who called this war a farce

And now I'm drowning, there won't be a song
To remember me, I'll be forgotten before it's long

Come, embrace me father and guide my lost soul
Hold me in your arms, I'm tired and old
The world has killed the child you loved
But don't abandon me now, you're all I've got


S.R.



Been long since I put up something. Did not want to abandon this place, so paying this visit. Will try to come back again soon. 

Wednesday, July 30, 2014

क्यों हैं ऐसे हम

रुक जाता गर पैरों को बाँध पाती बेड़ियां 
देख लेता जो आँखों पर ना लगा होता पर्दा 
जलाता इक मशाल करने को उजाला 
ना कि वो जो ज़िन्दगियों के दिए बुझाता

क्या दे सकता हूँ मैं दोष?
उस देश को जिसे बचाना कर्त्तव्य समझता था
या उस धर्म को जो मेरा परिवार अपना मानता था
जिसने धकेल दिया मेरे जैसों को इस अनचाहे नरसंहार में 
और रोते बिलखते अनगिनत लोगों को मौत के अंधकार में 

या हूँ मैं दोषी जिसने एक बात भी ना कही
जिसने उठाये तो शस्त्र परन्तु गलती पर जिसकी ऊँगली ना उठी
जिसे देश था प्यारा और उसके देशवासी
जिसने सोचने की कोशिश नहीं की ज़रा सी
इंसानियत को ना बचा पाने की कीमत क्या होगी
उसके बारे में नहीं सोचा, बस आज की चिंता की
इतिहास के पन्नों में बस झांक देख लेता
नफरत ने कितनी की है भारी तबाही 
पर क्या करूँ मैं

रुक जाता गर पैरों को बाँध पाती प्रेम की बेड़ियां 
देख लेता जो आँखों पर ना लगा होता नफरत का पर्दा

साकेत रन्जन-- 

Saturday, November 09, 2013

तन्हाई

अब तुमसे रोज़ तो मुलाक़ात नहीं हो पाती है, लेकिन
तुम्हारे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा ही गुज़रता है

याद है, तुम पीछे से चुपचाप आकर अपनी हाथों से मेरी आँखों को ढाँक दिया करती थी
ये आँखें आज भी उस स्पर्श को बेताब हैं, खुले रहकर बहुत आंसू इनसे बहता है

वो दुपट्टे में तेरे शीशे के चाँद जिनमें हम अपना चेहरा देखते थे
आईने तो कई हैं आज मेरे घर में, हमारे इक अदद दीदार की ख्वाहिश में हर एक तरसता है

वो गुलाब जो तुम्हारे बालों में शर्मा के लाल हो जाता था; मुस्कुराता, खिलखिलाता रहता था
आज बीमार है वो; पीला, उदास सा डाल पर, किसी के उसको चुराने का इंतज़ार करता है

वो चाय की गरम प्याली जिसकी हर चुस्की में तुम्हारी बातों और मुस्कान का मिठास घुला रहता था
आज पड़ा है किसी कोने में; असहाय, अनाथ सा, बस गिर कर टूट जाने की फ़रियाद करता है




साभार: सुयश अग्रवाल (शुरू की चंद पंक्तियाँ उन से उधार ली हैं)

Saturday, August 31, 2013

एक ऐसी रात में

इन खामोश सी रातों में, जब झींगुर की आवाज़ भी कानों को चुभती है
जब बादलों से भरे आकाश में तारे लुका छुपी खेलते हैं 
जब अँधेरे का स्याह रंग मन की वीरानियों को भरता जाता है 
जब अकेले बैठे,  हथेली में थामी कलम अनायास ही पन्नों पर चल पड़ती है 
पर लिख न पाती वो जो लिखने को उठी थी 
थोड़ी रूकती है, लिखाई टूट जाती है 
जाने क्यूँ भरी हुई स्याही सूख जाती है 
और मैं  ढूंढ ना पाता कोई दूसरा, कागज़ फाड़ देता हूँ 
इक अधूरी कविता से अच्छा तो नहीं है उसका अस्तित्व होना 

इक ऐसी अँधेरी रात में, कमरे के कोने में पड़े 
वो शब्द चमकते हैं, हर एक में अक्स है मेरा
मानो आईने के टुकड़ों में हज़ार शख्सियत हैं 
उन्ही सितारों की तरह जिनका आसमा एक ही है

Wednesday, August 28, 2013

सच्चाई की कड़वाहट

जब शिथिल, मुर्दे समान पड़ा भी कहे कि वो वीर है, 
तब संयम भी क्यूँ न तोड़ मर्यादा की बाँध अधीर हो
जब धुंध की काली चादर फैला आग लगाने वाला कहे वो बलवान है, 
तब उम्मीद का दिया जलाने वाले की वेदना क्यूँ न ज़ाहिर हो
जब वस्त्र पर रक्त की लालिमा की गहराई, कहलाने को शौर्य का प्रमाण हो; 
तब घाव पर मरहम लगाता वो वैद्य, मानो तो इन अमीरों के संसार का फ़क़ीर हो